राजस्थान सरकार ने रक्षाबंधन के अवसर पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को विशेष सौगात देने का निर्णय लिया है। राज्य की लगभग 1.25 लाख आंगनबाड़ी बहनों को रक्षाबंधन से पहले 501 रुपए की राशि सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जाएगी। साथ ही, उन्हें राजस्थान रोडवेज की बसों में दो दिन तक नि:शुल्क यात्रा की सुविधा भी दी जाएगी।
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5 अगस्त को ‘आंगनबाड़ी बहन सम्मान दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम में राज्य स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जो ‘सुरक्षा-सम्मान पर्व’ के अंतर्गत होगा। इस दिन सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को एक-एक छाता भी भेंट किया जाएगा।
ASHA सहयोगिनी क्या होती हैं?
ASHA (Accredited Social Health Activist) सहयोगिनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत चयनित एक प्रशिक्षित स्थानीय महिला स्वास्थ्य स्वयंसेविका होती है। यह अपने गाँव/वार्ड में समुदाय और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था (सब‑सेंटर/PHC/CHC) के बीच “लिंक‑वर्कर” की भूमिका निभाती है। सामान्यतः एक ASHA सहयोगिनी लगभग 1,000 की आबादी (कभी‑कभी भौगोलिक/जनजातीय परिस्थितियों के अनुसार कम‑ज़्यादा) को कवर करती है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता & ASHA सहयोगिनी में अंतर
- ASHA सहयोगिनी: स्वास्थ्य विभाग/एनएचएम से संबद्ध, समुदाय को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ना, घर‑घर विज़िट, रेफ़रल और स्वास्थ्य शिक्षा पर फोकस।
- आंगनबाड़ी कार्यकर्ता: महिला एवं बाल विकास विभाग (ICDS) से संबद्ध, पूरक पोषण, प्री‑स्कूल शिक्षा, गर्भवती/धात्री और बच्चों के पोषण‑सम्बंधी कार्यों पर फोकस।
दोनों मिलकर VHND, टीकाकरण और पोषण गतिविधियों में समन्वय करती हैं।
हालांकि, इस योजना में आशा सहयोगिनियों को शामिल नहीं किया गया है, जिससे उन्हें इस लाभ से वंचित रखा गया है। इसको लेकर कुछ असंतोष भी देखने को मिल रहा है, क्योंकि आशा सहयोगिनियां भी जमीनी स्तर पर महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान करती हैं।
राज्य स्तरीय कार्यक्रम के साथ-साथ जिले स्तर पर भी समारोह आयोजित किए जाएंगे। इसके लिए सभी जिला कलेक्टर्स को निर्देश जारी कर दिए गए हैं। जिला स्तरीय कार्यक्रमों में लगभग 600 आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व सहायिकाएं भाग लेंगी, जहां राज्य स्तरीय कार्यक्रम का सीधा प्रसारण भी किया जाएगा।
ASHA सहयोगिनी का दर्द — एक जमीनी सच्चाई
ASHA सहयोगिनी भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उनकी ज़िंदगी में चुनौतियों और उपेक्षा की एक लंबी फेहरिस्त है। ये महिलाएं गांव-गांव, घर-घर जाकर मां और बच्चे की देखभाल से लेकर टीकाकरण, परिवार नियोजन, TB/NCD जागरूकता जैसे दर्जनों काम करती हैं। पर उनके योगदान के बदले में जो उन्हें मिलता है, वो अक्सर अनदेखा, अनसुना और अन्यायपूर्ण होता है।
💔 1. मानदेय नहीं, मेहनताना मिलता है
ASHA कार्यकर्ता नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं मानी जातीं। उन्हें कोई तय वेतन नहीं मिलता, बल्कि कार्य-आधारित प्रोत्साहन (Incentives) के रूप में छोटी-छोटी राशियाँ दी जाती हैं। कई बार ये भुगतान महीनों तक अटक जाता है। 200–300 रुपए प्रति कार्य के हिसाब से मेहनत का कोई न्यायसंगत मूल्यांकन नहीं होता।
“हम दिन-भर दौड़ते हैं, रात में भी मरीज को लेकर अस्पताल जाते हैं, पर बदले में हर महीने बस 2000–3000 रुपए मिलते हैं — वो भी समय पर नहीं।”
😔 2. सम्मान की कमी
गाँव में लोग उन्हें “स्वास्थ्य दीदी” कहकर बुलाते हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर अक्सर इन्हें सिर्फ एक “वर्कर” या “वालंटियर” की तरह देखा जाता है। सरकारी कार्यक्रमों में इनका ज़िक्र नहीं होता, सम्मान समारोहों में आमंत्रण नहीं दिया जाता, और कई बार स्वास्थ्य केंद्रों में उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार होता है।
🚫 3. सामाजिक दबाव और असुरक्षा
घर-घर जाना, रात्रि में डिलीवरी केस को लाना, घरवालों की नाराज़गी, गाँववालों के ताने—इन सबके बीच एक महिला होने के नाते उन्हें असुरक्षा, थकान और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है। कई बार किसी मौत या लापरवाही का दोष भी इनके सिर मढ़ दिया जाता है।
📉 4. योजनाओं से वंचित
जब सरकारें आंगनबाड़ी बहनों के लिए घोषणाएं करती हैं—501 रुपए, छाता, या अन्य उपहार—ASHA सहयोगिनियों को उसमें शामिल नहीं किया जाता। जबकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनकी भागीदारी कहीं अधिक जमीनी और जोखिम भरी होती है।
“रक्षाबंधन पर आंगनबाड़ी को सम्मान, पर हमें तो सिर्फ ड्यूटी याद आती है।”
🔁 5. काम का कोई अंत नहीं
ASHA के काम की कोई घड़ी नहीं होती। COVID जैसी महामारी में भी उन्होंने घर-घर सर्वे किया, निगरानी की, दवा बाँटी, टीकाकरण किया। फिर भी उन्हें PPE किट तक नहीं दी गई। कई ASHA बहनें महामारी के दौरान संक्रमित भी हुईं और कुछ ने जान भी गंवाई—बिना किसी उचित मुआवज़े के।
✅ फिर भी उम्मीद बाकी है…
इन सबके बावजूद, ASHA बहनें अपने समुदाय के प्रति निष्ठा, सेवाभाव और जुझारूपन से काम करती हैं। उनकी यही भावना भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली को जीवित रखे हुए है। अब वक्त है कि उन्हें सिर्फ “स्वास्थ्य कार्यकर्ता” नहीं, सम्मानित स्वास्थ्य सेविका माना जाए—जिसे स्थायी वेतन, सामाजिक सुरक्षा, और योजनाओं में बराबरी का दर्जा मिले।




